पुतली कलाओं का घर भारत

Kapeesh Gaur

“हमारा देश भारत विविधताओं से भरे हुए एक विशाल वृक्ष के समान है। भारत की लोक कलाएँ इसका प्रतिबिंब हैं। पुतली नचाना लोकनाट्य की ही एक शैली है। पुतली कला बहुत पुराना नाटकीय खेल है, जिसमें लकड़ी, धागे, प्लास्टिक या प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी वस्तुओं द्वारा विभिन्न लोक कथाओं, प्रसंगों, पौराणिक व समसामयिक कहानियों का मंचन किया जाता है”।

पुतली शब्द लैटिन भाषा के ‘प्यूपा’ से लिया गया है, जिसका अर्थ ‘पुतली’ है। संस्कृत भाषा में भी इससे संबन्धित ‘पुतलिका’ तथा ‘पुत्तिका’ दो शब्द मिलते हैं जिनका अर्थ ‘छोटे पुत्रों’ से है। पुतली कला दुनिया के सबसे पुराने मनोरंजन के साधनों में से एक है। प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को विश्व पुतली दिवस के रूप में मनाया जाता है।

ऐसी कथा प्रचलित है कि सर्वप्रथम भगवान शिव जी ने काठ की मूर्ति में प्रवेश कर माता पार्वती का मन बहला कर इस कला को प्रारंभ किया। पवित्र हिन्दू ग्रंथ श्रीमद भागवत में, भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप की नहद कथा के अनुसार श्री कृष्ण द्वारा तीन धागों – सत, रज और तम के माध्यम से पूरे विश्व को कठपुतली की भाँति चलाने का उल्लेख मिलता है। हड़प्पा एवं मोहनजोदाडों की खुदाई में भी पुतलियों के अवशेष पाए गए थे। पुतली कला के बारे में लिखित प्रमाण प्राचीन तमिल ग्रंथ “शिल्प्पादिकारम” में मिलता है।   

पुतलियों का इस्तेमाल सूचना व संचार के लिए काफ़ी पहले से हो रहा है। भारत में तो इस कला का इतिहास लगभग दो हज़ार वर्ष पुराना है। पहले नाटकों को प्रस्तुत करने का एकमात्र माध्यम पुतलियाँ ही थीं। परंपरागत रूप से नर्तक गाँव में जाकर लोगों का मनोरंजन करते थे। राजस्थानी कठपुतली कला का विषय चर्चित प्रेम प्रसंगों के लिए जाना जाता है। मध्यकालीन राजस्थानी पोशाक पहने कठपुतलियों द्वारा इतिहास के प्रेम प्रसंग दर्शाए जाते रहे हैं। अमर सिंह राठौर का चरित्र काफी लोकप्रिय रहा है। इन कठपुतलियों से स्थानीय चित्रकला, वास्तुकला, वेशभूषा और अलंकारी कलाओं का पता चलता है।

पुतली कला कई कलाओं का मिश्रण है जैसे – नाट्य कला, चित्रकला, वेशभूषा, मूर्तिकला, काष्ठकला, वस्त्र-निर्माण कला, रूप-सज्जा, संगीत, नृत्य आदि।

भारत में पुतली कला की कई शैलियाँ हैं, जैसे- धागा पुतली, छायापुतली, छड़ पुतली, दस्ताना पुतली आदि। धागा कठपुतली कला, इसमें अनेक जोड़युक्त अंगों का धागों द्वारा संचालन किया जाता है। वहीं छाया पुतली कला में पर्दे को पीछे से प्रकाश प्रदीप्त किया जाता है और पुतली का संचालन प्रकाश स्रोत तथा पर्दे के बीच से किया जाता है। जबकि दस्ताना पुतली को हथेली पुतली भी कहा जाता है। इसके अलावा छड़ पुतली कला वैसे तो दस्ताना पुतली का ही अगला चरण है, लेकिन यह उससे काफी बड़ी होती है ।

भारत के विभिन्न प्रदेशों में पाए जाने वाली पुतली कलाएँ इस प्रकार से हैं ।

पुतली कला का नामपुतली कला के रूप पुतली कला का प्रदेश
कठपुतली
कुनढेई
गोम्बेयट्टा
बोम्मालट्टा
धागा पुतली राजस्थान
ओड़ीशा
कर्नाटक
तमिलनाडु
तोगालु गोंबेयट्टा
तोलु बोम्मालट्टा
रावण छाया
छाया पुतली कर्नाटक
आन्ध्र प्रदेश
ओड़ीशा
पुत्तलनाच
यमपुरी
छड़ पुतलीपश्चिम बंगाल
बिहार
पावाकूथू दस्ताना पुतलीकेरल

 

आज वक्त की मांग है कि पुतली कला के कलाकारों को समाज के स्तर पर बढ़ावा मिले। वहीं पुतली कला में पूंजी और तकनीकी का निवेश भी हो जिससे पुतली कला को प्रोत्साहन मिले।

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