कमरा खाली है
और बत्ती जल रही है।
कीडे़-मकोडे़ कहीं नहीं दीखते।
फिर भी दीवार पर एक छिपकली चल रही है।
सेज पर फूलों का गुलदस्ता है
ताजा और रंगीन ।
वह कुछ बोलना चाहता है।
फुलवारी में सारे राज
आशकार ( प्रकट ) नहीं हुए।
वह कमरे में भी कोई भेद
खोलना चाहता है?
लेकिन वह कौन है।
उसकी बात सुनने वाला कौन है।
कमरा खाली है!
और बत्ती जल रही है।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता, कमरा खाली है … में घर का बिंब है।
कमरा खाली है, कविता में कवि काव्यानुभूति की रिक्तता को अभिव्यक्त करता है। यह कमरा कवि का हृदय है, लेकिन वह खाली है। हृदय में प्रेम की अनुभूति है लेकिन वह प्रकट नहीं हो रही है।
Leave a reply to Sunil Kumar जवाब रद्द करें