‘अकाल और उसके बाद’
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा घर के अंदर कई दिनों के बाद
चमक उठीं घर भर की आँखें कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद
नागार्जुन की: ‘अकाल और उसके बाद’ , कविता में अकाल का भयानक चित्र है। आठ पंक्तियों में कवि ने गृहस्थ जीवन के संपूर्ण अभाव की कहानी कह दी है। आँगन में धु़आँ उठने का मतलब है कि खाना पकाया जा रहा है। अकाल पीडितों के लिए चूल्हा जलना एक चमत्कारिक घटना हो जाती है। अन्न के दाने का महत्व कितना बड़ा होता है यह अकाल में तबाह लोग ही जान सकते हैं। किसान केवल मनुष्य के लिए ही नहीं संपूर्ण सृष्टि के लिए महत्वपूर्ण है। श्रम के बिना कुत्ते और चूहे भी अपना पेट नहीं भर सकते हैं।


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