रोटी और संसद

रोटी और संसद
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है।
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है।
वह रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ –
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
मेरे देश की संसद मौन है।
हिन्दी साहित्य में धूमिल के नाम से प्रसिद्ध कवि सुदामा पाण्डेय की कविता-
‘रोटी और संसद’  में देश की राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य किया गया है। राजनीतिक व्यवस्था जनता की रोटी से खेलती है। रोटी जीने की प्राथमिक ज़रूरत है। गंदी राजनीति जनता की इस मूलभूत ज़रूरत को भी नजरंदाज करती है। 

टिप्पणी करे

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें