आईना The Mirror
कल्पना
आईना आज मुझसे, एक बात.. बोल बैठा
ना जाने कैसे ! लेकिन, एक राज़ खोल बैठा।
कहने लगा बेशक, मुझमें सबकी तस्वीर दिखती है
किसी की हँसी तो किसी की पीड़ा मुझमें दिखती है।
हँसते के संग हँसू मैं और रोते के संग रोऊ
मेरे जैसे सब बन जाते और मैं सब-सा होऊ ।
लेकिन फिर ये सोचूं, क्या मेरा भी है कुछ अपना
मेरी इच्छा, मेरी चाहत, मेरी खुशी, मेरा सपना ।
कभी-कभी मन ना भी चाहे, तब भी सच बतलाता हूँ
केवल सच ही दिखाई दे मुझमें सच ही दिखलाता हूँ।
केवल सच ही दिखाई दे मुझमें सच ही दिखलाता हूँ।
मैंनें सारी बातें सुनकर उसको कुछ समझाया ।
आज के इस युग में देखो हर ओर पड़ा झूठ का साया है ।
नहीं किसी में हिम्मत खुलकर सच्चाई की भाषा बोले
झूठ के पथ पर चलते हैं सब न कदम किसी का डोले ।
आईना है एक जो सबको सबका सच्चा अक्स दिखलाए
हर पल सच्चाई का बस ये सबको पाठ पढ़ाए।



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