सीमाएँ और बन्धन

सीमाएँ और बन्धन
  एकलव्य की कथा में गुरुदक्षिणा की सीख के बारे में तो आप सभी जानते होंगे, लेकिन उसी कहानी में दी गई एक और सीख के बारे में आज अपने इस ब्लॉग पर संक्षेप में बताने की कोशिश कर रहा हूँ।………
कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर के समीप एकलव्य नामक एक छोटा-सा बालक रहा करता था जिसका  जन्म समाज के एक निर्धन व पिछड़े वर्ग में हुआ था।  गन्दगी व कूड़ा-कच़रा साफ करना ही उनका व्यवसाय था।जिसकेकारण इन्हें समाज द्वारा अस्वीकृत तथा तिरस्कृत भीकिया जाता था।  एकलव्य तथा उसके समूह के सभी बालक ये जानते थे, कि उन्हें भी रोज़गार के लिए अपने माता पिता के पेशे को ही अपनाना पडे़गा । क्योंकि उन्हें यही कहा जाता था कि “तुम सब शिक्षापाने के लिए नहीं बनें हो, हमारा काम कूड़ा-कचरा उठाने का है। भला, इसके लिए किसी शिक्षाकी क्या जरूरत ?“
एक दिन एकलव्य ने देखा !  उसके गांव के समीप, जंगल में शानदार रथों से, खूबसूरत वस्त्र पहने उसी की उम्र के कुछ बालक उतर रहे हैं। जिनके बाद एक वृद्ध व्यक्ति रथ से उतरा । बर्फ के समान सफेद बाल और बिना किसी दाग़ के सफेद वस्त्र पहने यह व्यक्ति शांत किन्तु कठोर स्वभाव का प्रतीत हो रहा था । वृद्ध व्यक्ति को देख लड़के कुछ सहमे हुए थेलेकिन उन्हीं में एक मासूम,सुन्दर बालक था जिसके प्रति वृद्ध का व्यवहार कुछ अलग था । वह मुस्कराते हुए उसके सर को हाथों से थपथपा रहा था ।
उनके समीप मत जाना एकलव्य !, वे उच्च कूल में जन्में हैं हम नीच कूल में, पाप लगेगा। एकलव्य के पिता ने आवाज़ दी। वापिस आजा बेटा, यहाँ बहुत काम बाकी है। वे सभी कौरव-पाँडव राजकुमार अपने गुरु द्रौणाचार्या के साथ यहाँ धनुर्विध्या का अभ्यास करने आये हैं। और वह बालक जिसके  सर को वे हाथों से थपथपा रहें हैं उनका प्रिय शिष्य अर्जुन है। “पिता जी, मुझे भी गुरु द्रौणाचार्या से धनुर्विध्या सीखनी है, और आशीर्वाद स्वरूप थपथपी लेनी है।“ एकलव्य बोला। पिता ने एकबार फिर कहा, “तुम उनके समीप मत जाना !”
एकलव्य ये सब नहीं समझ पाया था। उसने माँ से पूछा  क्यों, आखिर क्यों?” हम नीच कूल में जन्में हैं और वे उच्च कूल में। वह बोली, भगवान ने ही ये सीमाएँ बनाई हैं।
  “भगवान ने !क्यों? भगवान उनके लिए अच्छी चीजें और हमारे लिए बुरी चीजें चाहेंगे। एकलव्य ने पूछा, क्या? भगवान ने हम सबको नहीं बनाया ।
वह बोली, बेटा मैं नहीं जानती, लेकिन भगवान के बनाए कुछ नियम और सीमाएं हैं जिन्हें  हम लाँघ नही सकते।
एकलव्य अब शांत रहने लगा था। उस दिन के बाद से उसके लिए सबसे ज्यादा महत्व की चीज़ केवलसीमाओं’ का आंकलन करना व उनके मतलब को समझना था। 
एकलव्य अब बालकों को धनुष बाणं से अभ्यास करते हुए देखता। अर्जुन तो क्या अदभुत कला-कौशल का प्रदर्शन कर रहा था वह अपनी आँखों को बन्द करके भी अचूक निशाना लगाने के साथ-साथ दाएं व बाएं दोनों  हाथों से लक्ष्य को भेदने की क्षमता रखता था। और गुरु द्रोणाचार्य उनके बाणं तो आग बरसा रहे थे, वे लक्ष्य को शून्य में से भेद सकते थे, वर्षा, आंधी-तूफान और बिजली तक बरसा सकते थे।  ये सब चमत्कारिक था। 
अर्जुन की आँखें अपने गुरु से नहीं हटती थी ऐसा लगता था मानों वह उनके अन्दर  ज्ञान के एक-एक रेशे को अपने अन्दर समाहित करना चाहता हो। यही कारण था, कि द्रोणाचार्य भी अर्जुन पर बेहद गर्व करते थे।
जब अभ्यास समाप्त हुआ, एकलव्य दौड़कर द्रोणाचार्य के समीप पहुँचा और हाथ जोड़कर विनती करने लगा। हे, महान गुरु  मुझे भी आपसे धनुर्विध्या सीखनी है।
“मैं किसी नीच-कूल में जन्में को नहीं सिखाता,” द्रोणाचार्य ने बेहद ठंडा़-सा उत्तर दिया ओर चल दिये।
गुरुवर, आपके बाणं तो किसी भी सीमाओं का ख्याल नहीं रखते, वे वर्षा ओर आग बरसा सकते हैं,दिन ओर रात कर सकते हैं। किन्तु उच्च और नीच कूल के संकीर्ण विचारों में आप कैसे बन्धे हुए हैं। ” ये कहता हुआ वह वहाँ से चला गया।
एक दिन एकलव्यऔर उसके दोस्तों ने एक छोटी-सी चींटी को फांसने के लिये धागे का जाल बनाया और उसे फंसाने लगे चींटी ने कोशिश की और इसी कोशिश में जब उसे जाल के किनारे पर एक छोटी सी जगह  मिलीतो वह भाग निकली।

 “बहादुर चींटी ने सीमा तोड़ दी थी।
एकलव्य  समझ गया सीमा को तोड़ा जासकता हैंमैं भी मुक्त हो सकता हूँ
अगले दिन, एकलव्य ने एक पेड़ के तने में चाकू से द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाई। उसने अपने आप ही धनुष और बाणं बनाए । प्रतिदिन वह प्रतिमा के सामने  धनुर्विध्या का अभ्यास करता और सोचता एक दिन अवश्य द्रोणचार्य उसे भी अजुर्न की तरह आशीर्वाद  स्वरूप थपथपी देंगे।
कई महीनों बाद,  राजकुमार एकबार फिर अपने गुरु के साथ जगंल में वापिस लौटे। एक दिन जैसे ही अर्जुन एक कठिन लक्ष्य पर निशाना लगाने पहुँचा। इससे पहले कि अर्जुन निशाना साधता, एक तीर अर्जुन के लक्ष्य को भेद गया !!
सभी बालक और उनके गुरु स्तब्ध रह गये !!!!! कि इतना कठिन लक्ष्य अर्जुन से पहले ऐसा कौन है? जो भेद सकता है। उन्होनें आसपास मुड़कर देखा, तभी उन्हें एकलव्य आता दिखा, उसने द्रोणाचार्य के चर्णस्पर्श किये।
“तुम्हारा गुरु कौन है??” द्रोणाचार्य ने पूछा। एकलव्य  चुपचाप उन्हें प्रतिमा के पास ले गया। अपनी प्रतिमा वहाँ पाकर द्रोण कुछ समय के लिए इसे देखते ही रहे, और फिर कहा, “यदि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, तो तुम्हें मुझे मेरी गुरु दक्षिणा देनी होगी।

एकलव्य “ने सर झुकाकर  कहा मांगो, श्रीमान। “मैं तुम्हारा दाहिना अंगूठा चाहता हूँ” पत्थर दिल द्रोण ने कहा। सही  अंगूठे के बिना, कभी भी कोई आर्चर धनुष कैसे पकड़ सकता हैं, अर्जुन और अन्य बालक सदमे में ये सब देखते रहे, एकलव्य निशब्द था। उसने अपने दाहिने अंगूठे को काट कर द्रोण के पैर पर रख दिया।

कई साल बीत गए थे। कुरुक्षेत्र में चचेरे भाई कौरवों और पांडवों के बीच एक महान युद्ध हो रहा था। अर्जुन पांडवों की ओर था। उनके शिक्षक, द्रोण और चचेरे भाई दूसरी तरफ थे।

दिन की लड़ाई के बाद, एक दिन दुखद द्रोण अपने शिविर में बैठा हुआ था। अचानक एक सम्मानजनक प्रार्थना की तरह, तीर उसके एक के बाद एक पैर के पास गिर गया। उन्होंने देखा?

क्यों, एकलव्य! युवा एकलव्य ने कहा, ” गुरुवर, मैंने मेरे दाहिने अंगूठे के बिना भी निशाना लगाना सीखा लिए है। मैं अब अपने बाएँ हाथ से भी निशाना लगा सकता हूँ, और मेरे पैरो से भी। आज मैं दूसरों को सिखाता हूँ और अपनी सेना भी बनाई है व  मैं एक महान धनुर्धर के रूप में जाना जाता हूँ।

द्रोण अवाक था!!!!

” गुरुवर, मैंने आपकी महानता अपने खुद के मन की सीमाओं में से स्वतंत्र निर्धारित करके। मैंने आपको मूर्ति के रूप में

अपना शिक्षक बना दिया।

अर्जुन के लिए आपका प्रेम जब निष्पक्षता की सीमा को पार कर गया था और आपने मेरे अंगूठे के लिए कहा। आपने सोचा कि यह मुझे एक  धनुर्धर के रूप में खत्म कर देगा । लेकिन अंत में हमेशा कुछ सीख मिलती है और ये अनुभव भी मुझे कुछ सिखा गया। मेरे अंगूठे को माँगने के बाद, आप ने मुझे दोनों हाथों और पैरों के साथ भी निशाना लगाना सीखो की प्रेरणा दी और इस सबक के लिए, मैं इस युद्ध में आपको अपनी सेवाएं प्रदान करना चाहता हूँ। ”

द्रोण की आँखें आँसुओं से भर गई। उन्होंने उत्तर दिया, “हाँ, यह सच है, सीमाएँ और बन्धन केवल मन का द्वन्द हैं। वास्तविक साहस गलत सीमा (लोगों) को पहचान कर उनके खिलाफ लड़ना, और सही लोगों का सम्मान करने में है।  एकलव्य, तुमने मुझे यह सिखाया है।”

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