गोपाल दास नीरज – कारवाँ गुजर गया..

मेरे प्रिय कवि और साहित्यकार गोपाल दास नीरज के साहित्यिक सागर से एक मोती चुनकर आपके लिए निकाल कर लाया हूँ। नीरज हिन्दी साहित्य का अनमोल हीरा हैं, जिनकी समझ इतनी सशक्त है की आम आदमी को वास्तविक जीवन दर्शन का एहसास करा देती है। गोपाल दास नीरज के बारे मैं जितना कहो शब्दों की कमी का आभास हो सकता है…. इसका अन्दाज़ा इन पक्तिंयों से हो सकता है……. 
गोपाल दास नीरज – कारवाँ गुजर गया 
 
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से                
लुट गये सिंगार सभी बाग के बबूल से    
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे
नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी
पाँव जब तलक उठें कि जिन्दगी फिसल गयी
पात पात झर गये कि शाख शाख जल गयी
चाह तो निकल सकी न, पर उम्र निकल गयी
गीत अश्क़ बन गये, छंद हो द्फन गये
साथ के सभी दिये, धुआँ पहन पहन गये
और हम झुके झुके, मोड़ पर रुके रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे
क्या शबाब था कि फूल फूल प्यार कर उठा
क्या सृँगार था कि देख आईना सिहर उठा
इस तरफ जमीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नजर उठा
एक दिन मगर यहाँ, ऐसी कुछ हवा चली
लुट गयी कली कली, कि घुट गयी गली गली
और हम लुटे लुटे, वक़्त से पिटे पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
करवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे
हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमि पर उतार दूँ
हो सका न कुछ मगर, शाम बन गयी सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर बिखर
और हम डरे डरे, नीर नयन में भरे
ओढ़ कर कफन, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमुक उठे चरन चरन 
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन नयन
पर तभी ज़हर भरी, गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चुनरी
और हम अजान से, दूर के मकान से
पालकी लिये हुए, कहार देखते रहे
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे !
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे !!
चित्र- गूगल से साभार

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