पतंग’ शब्द बहुत प्राचीन है। सूर्य के लिए भी पतंग शब्द का प्रयोग किया जाता है, कीट-पतंगे आज भी प्रचलित शब्द है। हर इंसान अपने जीवन में ऊँचाइयों को पाने की ख्वाहिशें रखता है, और ये ख्वाहिशें भी कितनी खानाबदोश होती हैं। क्या पता? ऐसी ही एक ख्वाहिश इंसान ने पाली हो, आसमान में रंग भरने की! और भर ली पतंग ने उड़ान। पतंग भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में एक शौंक का माध्यम बनने के साथ-साथ आशाओं, आकाँक्षाओं और मान्यताओं को पंख भी देती है। हवा में डोलती अनियंत्रित डोर थामने वालों को आसमान की ऊँचाइयों तक ले जाने वाली पतंग अपने 2000, हज़ार वर्षों से अधिक के इतिहास मैं अनेक मान्यताओं, अंधविश्वासों और अनूठे प्रयोगों का आधार भी रही है। अपने पंखों पर विजय और वर्चस्व की आशाओं का बोझ लेकर उड़ती पतंग ने अपने अलग-अलग रूपों में दुनिया को न केवल एक रोमांचक खेल का माध्यम ही दिया, बल्कि एक शौंक के रूप में यह विश्व की विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृतियों में रच-बस गई।
माना जाता है, की पतंग का अविष्कार ईसा पूर्व तीसरी सदी मैं चीन मैं हुआ था। दुनिया की पहली पतंग दार्शनिक ‘मो दी’ ने बनाई थी। इस प्रकार पतंगों का इतिहास 2,300 वर्ष पुराना है। पतंग बनाने का उपयुक्त सामान चीन मैं उपलब्ध था। जैसे : रेशम का धागा और पतंग के आकार को सहारा देने वाला हल्का और मजबूत बांस।
पतंग एक धागे के सहारे उड़ने वाली वस्तु है, जो धागे पर पड़ने वाले तनाव पर निर्भर करती है। पतंग तब हवा मैं उड़ती है जब हवा (या कुछ मामलों मैं पानी) का प्रवाह पतंग के ऊपर कम दबाव और पतंग के नीचे अधिक दबाव बनता है। यह विक्षेपन हवा की दिशा के साथ क्षैतिज खींच भी उत्पन्न करता है। पतंग का लंगर बिंदु स्थिर या चलित हो सकता है। पतंग आमतौर पर हवा से भारी होती है लेकिन हवा से हल्की पतंग भी होती हैं। जिसे हैलिकाईट कहते हैं। ये पतंगें हवा में या हवा के बिना भी उड़ सकती हैं। हैलिकाईट पतंगें अन्य पतंगों की तुलना में एक अन्य स्थिरता सिद्धांत पर काम करती हैं, क्योंकि हैलिकाईट हीलियम-स्थिर और हवा-स्थिर होती हैं। वैसे पतंगों के कई नाम होते हैं,जैसे चिडा, परियल,तिरंगल वगैरा- वगैरा जो की हर कोई अपने अनुसार रख भी लेता है।
प्राचीन दंत कथाओं पर विश्वास किया जाये तो चीन और जापान में पतंगों का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए भी किया जाता था। चीन में किंग राजवंश के शासन के दौरान उड़ती पतंग को यों ही छोड़ देना दुर्भाग्य और बीमारी को न्योता देना के समान माना जाता था। कोरिया में पतंग पर बच्चे का नाम और उसका जन्म दिवस लिखकर उड़ाया जाता था ताकि उस साल उस बच्चे से जुड़े सारे दुर्भाग्य पतंग के साथ ही उड़ जाए, मान्यताओं के मुताबिक थाईलैंड में बारिश के मौसम में लोग भगवान तक अपनी प्रार्थना पहुँचाने के लिए पतंग उड़ते थे। जबकि कटी पतंग को उठाना अपशकुन माना जाता था। दुनिया के कई हिस्सों का सफ़र तय करके पतंग जब भारत पहुंची, तो यहाँ की गंगा- जमुना संस्कृति में मिलकर इसने अपने अलग ही रंग बिखेरे। भारत में पतंगबाजी इतनी लोकप्रिय हुई कि कई कवियों ने इस साधारण सी हवा में उड़ती वस्तु पर भी कवितायेँ लिख डाली। हिन्दी फिल्मों के कई गीतों में पतंग और हमारे जीवन में समानता दिखाते हुए कई गीत मिल जायंगे। ‘खालिद हुसैनी’ की चर्चित किताब ‘काईट रनर’ में भारत में पतंगबाजी तथा इसके शगल से जुडी रवायतों और उसूलों का बडी शिद्धत से ज़िक्र किया गया है। लेकिन ऐसे प्रसंगों से संकेत भी मिलते हैं। की दुनिया में पतंग का आविष्कार भारत में ही हुआ हो, क्योंकि रामचरित मानस में महा-कवि तुलसीदास जी ने बालकाण्ड में उन प्रसंगों का उल्लेख किया है। जब भगवान श्री राम ने अपने भाइयों के साथ पतंग उडाई थी :
राम इक दिन चंग उडाई।
इन्द्रलोक में पहुंची जाई॥
श्री राम अपने भाइयों और मित्रमंडली के साथ पतंग उड़ा रहे थे मकर संक्रांति का दिन था। और उस समय हनुमान जी भी अपने बाल रूप में वहां उपस्थित थे। कहा गया है, की पतंग उड़ते हुए इन्द्रलोक तक जा पहुंची थी। बहरहाल ये तो सब रही पतंग से जुड़े इतिहास की बातें कभी आपने सोचा है पतंग और हमारे जीवन का सफर कितना मिलता जुलता है। पतंग के आसमान में शिखर छूने से लेकर कटने और फ़िर ज़मिदोज़ होने तक की सारी क्रियाओं की तुलना अगर हम अपने जीवन चक्र से करें तो इनमें बेहद समानता मिलेगी इसलिए कभी गौर से इसके उतार-चढाव को महसूस करके देखें कुछ न कुछ सीख जरुर मिल ही जायेगी। पतंग के बारे में बात चले तो सभी के पास अपने अपने अलग अनुभव और किस्से मौजूद रहते हैं। एक समय में मनोरंजन के प्रमुख साधनों में से एक रही पतंग, समय कि कमी के कारण ही अब इतिहास में सिमटने को तैयार है । एक तो समय का आभाव और दूसरा खुले स्थानों कि कमी के चलते इस शौंक में कमी आ रही है। अब तो केवल कुछ विशेष दिनों और पतंग उत्सवों में ही पतंगो के दर्शन हो पाते हैं। राजस्थान में पर्यटन विभाग कि तरफ से प्रतिवर्ष तीन दिवसीय पतंगबाजी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमें देश -विदेश के पतंगबाज हिस्सा लेते हैं। मकर संक्रांति के दिन भी परम्परागत रूप से पतंगबाजी का आयोजन किया जाता है इसका एक धार्मिक महत्व भी है क्योंकि इस दिन से सूर्य मकर रेखा से उत्तर कि तरफ बढ़ना आरम्भ हो जाता है। दिल्ली और लखनऊ मैं स्वतंत्रता दिवस पर पतंगबाजी का नज़ारा देखा जा सकता है। यद्यपि आज के भागमभाग पूर्ण जीवन में खाली समय के कारण यह शौंक कम होता जा रहा है। लेकिन यदि अतीत पर नज़र डालें तो हम पाएंगे कि इस साधारण सी पतंग का मानव सभ्यता के विकास में कितना महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

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