धर्म की दुकान!
पढ़ाई पूरी कर चुका युवक जब नौकरी न पा सका। तो एक दिन थक-हार कर एक पहुंचे हुए संत के आश्रम में जा पहुँचा। संत को अपनी व्यथा सुनाई, तो संत ने उसे एक रास्ता बताया-
कि हे वत्स-
‘घनी’ आबादी वाले इलाके में मंदिर खोल लो,
‘धर्म’ को जीविका से जोड़ लो।
इतना कमाओगे कि संसार रूपी भवसागर में तर जाओगे।
संतरी से लेकर मंत्री तक सब आ कर शीश झुकाएंगे।
आशीर्वाद लेकर जायेंगे।
जनता तुम्हें अवतार समझ सर आँखों पर बिठाएगी।
कई कुंवारी अकुंवारी नारियां भी तुम्हारी शरण मैं आएँगी।
पुलिस वाले भी तुम से घबराएंगे, जब कमिशनर साहब खुद प्रसाद ले जायेंगे।
भला इतना सब कुछ किस धंधे, सर्विस में पाओगे?
देर न करो शुभकार्य में वरना फिर पछताओगे।


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