निन्दाशास्त्र (व्यंग्य)

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आज के जीवन का केंद्रबिंदु अधिकांशतः संवेदनहीनता, आपाधापी, स्वार्थपरता और घोर भौतिकतावादी समाज में अपने पड़ोसी से बेहतर जिंदगी जीने की तीव्र इच्छा है, इसलिए समाज में विभिन्नता फैली हुई हैं अरे भई, आपलोग क्या सोचने लगें !

मैं तो रसों की बात कर रहा था, और ये जो रस है वास्तव में बेहद ख़ास है और कारगर भी क्योंकि , स्रष्टि की उत्पत्ति के पश्चात सामाजिकरण की प्रक्रिया में वैचारिक आदान-प्रदान के बाद जब- तब किसी व्यक्ति या व्यक्ति के समूहों की स्वार्थ की पूर्ति नही हो पाती तो उसके मन में यह रस स्वतः ही पैदा हुआ होगा । यह और कोई रस नही है भाई, यह निंदा का रस है । इस दौर में ऐसा कोई व्यक्ति मेरे ख्याल में शायद ही कोई होगा जो इस स्वाद भरे रस का पान नही करता हो, ये है ही इतना आनंद दायक कभी -कभी व्यक्ति की स्वार्थ-पूर्ति में जिसने बाधा पहुँचाई उसी के विरोध में रस के माध्यम से वह अपने मन के गुबार को बाहर निकालता है । कभी पीठ पीछे बुराई के द्वारा मन की आहात भावनाओ को व्यक्त करके भी इस रस का मजा लिया जाता है ।

कुछ भी हो प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक और भविष्य में भी इसके आस्तित्व को समाप्त नहीं किया जा सकेगा। हमारे हिन्दी साहित्य के व्याकरण में इस रस को अलग से स्थान नहीं मिला, लेकिन प्रेम , श्रंगार , वीर , रौद्र आदि रसों के साथ कहीं न कहीं इसे स्थान मिला है ।
इस रस की उत्पति के कई कारण हो सकते है, लेकिन मूलतः वैचारिक असमानता के होने से जब व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति नहीं हो पाती तो हम वास्तविक गुणों का मूल्यांकन न करके ग़लत रूप से किसी व्यक्ति का आंकलन करने लगते हैं । विश्व के कण-कण में पाया जाने वाला यह रस अपनी तेज किरणों से सारे संसार को आहत करने में लगा है । यही कारण है की आज कल हमारे संयुक्त परिवारों का विघटन इसी रस के द्वारा हो रहा है , अहमवादी विचारो के पनपने से संकीर्ण स्वार्थ भावना जन्म लेने लगती है , त्याग की भावना नष्ट होती चली जाती है । आपसी खींचतान के होते ही परिवार टूटने लगता है और यही निंदा रस इस टूटन की प्रक्रिया में उत्प्रेरक कार्य करता है ।
जनाब ! ये केवल परिवार तक ही सीमित नहीं है हमारे सामाजिक, आर्थिक, साहित्यिक, धार्मिक और सांस्कृतिक वर्गों में भी इसने अपनी महत्वपूर्ण जगह बना ली है । निंदा करने के कई तरीके होते हैं लेकिन जब ये समूहों में की जाती है तो अपना अलग ही मज़ा देती है लेकिन कई बार इसका मज़ा स्वादिष्ट होने की बजाए कड़वा भी हो सकता है ।

हमारे भारत में आजकल चुनावी माहौल गर्म है अजी, चुनाव मैं यदि राजनितिक पार्टियां अपने विपक्षी दलों की घोर निंदा करके अपने एजेंडे को दूसरी पार्टी से बेहतर नहीं दिखाएंगी तो फ़िर वह किस काम की राजनितिक पार्टी भाई , जनता के वोट भी तो लेने हैं और ऐसा केवल पुराने मुद्दों पर बहस करके, एक दुसरे की निंदा करके ही हो पाएगा, ऐसा हमारे देश के सभी दल सोचते हैं क्योंकि सत्ता पक्ष व् विपक्ष दोनों वाद-प्रतिवाद में केवल निंदा स्वर में ही बात कर रहे हैं।
एक नया तरीका जनता ने भी निकला है निंदा करने का और ये इराक़ से चलकर भारत पहुंचा तथा आजकल संक्रमण की तरह फ़ैल रहा है , जो मर्जी चाहे इसको हमारे नेताओं पर आजमा रहा है, अरे! क्या नहीं पहचाना इसे ये अपने पैर का जूता ही है , इससे तो अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश भी नही बच पाए, वैसे हमारे जैसे सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के लिए ये एक शर्म की ही बात है की जनता की चुनी हुई सरकार के प्रतिनिधियों पर सार्वजनिक रूप से जूते चलाकर लोग अपना विरोध दर्ज करवा रहे हैं ।

भगवान् बुद्घ ने निंदा रस को अपने जीवन से हमेशा के लिए त्याग देने का संदेश संसार को दिया था । जब भी कोई व्यक्ति उनके पास आता था तो वे हमेशा उसकी अच्छी बातों को ही ऊजागर करने का प्रयास करते थे । अच्छाइयों के प्रकाश में बुराइयों का अन्धकार अपने आप ही समाप्त हो जाता था।

कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से हो गई किसी भूल या मानवीय गलती पर यदि सार्वजनिक रूप से उसे ज़लील करता है, बुरे शब्द बोलकर उसकी भावनाओं को आहत करता है तो निन्दित व्यक्ति हतोत्साहित होकर निंदक के प्रति अपने दिल में परोक्ष रूप में ही सही द्वेष तथा प्रतिशोध की भावना रखता है, जो की प्रत्यक्ष निंदा की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होती है, संयुक्त परिवारों में टूटन का कारण यही बनती है , हमने देखा है की जब अपने ही घर में पिता- पुत्र को , बड़ा भाई छोटे भाई को, पत्नी-पति को किसी बात पर कुछ कहते है तो कहीं न कहीं भीतरी मन में इसके अलग प्रभाव होते हैं। लेकिन जब हम अपने किसी प्रिय व्यक्ति की निंदा करते हैं, हमें उसके किसी अनचाहे काम पर गुस्सा आता है, तब ऐसी निंदा चाहे प्रत्यक्ष हो या फ़िर परोक्ष , निन्दित व्यक्ति के जीवन को सुधारने के लिए ही होती है, जब हम अपने प्रतिस्पर्धी की सफलता के कारण उसकी बुराई करते है तो ये केवल हीनभावना के कारण ही होती है , उस समय हम अपनी कमियों को छुपाकर ऐसी बातें करते हैं, इसलिए निंदा अपनी कमियों को छुपाने का एक कारगर हथियार है।

निंदा बेहद घातक तब बन जाती है जब इसे धर्म व् संप्रदाय विशेष के ऊपर किया जाता है, और सही मायने में उस समय ये खून-खराबे तक भी पहुँच सकती है, जोकि मानवीयता के लिए बहुत दुर्भाग्यता पूर्ण स्थिति खड़ी कर सकती है । इसलिए धर्म के प्रति सदैव आदर भाव ही रखना चाहिए , धर्म कोई भी हो, सभी को समान समझना चाहिए । इस कारण धर्म में निंदा रस बहुत जहरीला होता है।

महात्मा कबीर ने निंदक को अपना प्रिये बना लेने की बात कही थी , क्योंकि निंदक ही हमारे ह्रदय की कलुषता को धोकर निर्मल बनता है ।

“निंदक नियरे राखिये , आँगन कुटी छुवाया
बिन पानी साबुन बिना , निर्मल करे सुहाए ।”

कुछ भी हो निंदा रस से हमें जो भी संतुष्टि या आनंद मिलता है , वह होता तो अस्थाई परन्तु हमारे अन्दर के गुबार को बाहर निकलने में बेहद कारगर साबित होता है।

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